Thursday, 5 March 2009

आस-पास एक पृथ्वी चाहिए

टिमटिमा-टिमटिमा कर
वह पृथ्वी की नज़रों में आना चाहता था
ज्यादा से ज्यादा देर तक
उसकी नज़रों में बस जाना चाहता था
उसकी सोच पर हावी हो जाना चाहता था।

वह सूरज से ‘जलता’ था

कि क्यों सूरज की तरह
वह पृथ्वी के पास नहीं है?
जब कि देखा जाए तो
वह भी एक जलता हुआ सूरज ही है।
फिर क्यों उसका जलना
महज टिमटिमाना है पृथ्वी के लिए
जबकि सूरज का जलना, चमकना।

और क्यों रहती है पृथ्वी
बुझी-बुझी
जब ग्रहण लग जाता है सूरज को
मानो मातम मनाती हो।

उसका बस चलता
तो कभी पृथ्वी को यूँ हसरत से न देखता
पर क्या करता
कि स्वयं को ‘सूरज’ महसूस करने के लिए
उसे अपने आस पास एक पृथ्वी चाहिए ............

पृथ्वी से बहुत दूर
एक सितारा
कुछ इस तरह टिम टिमाता रहता था।

4 comments:

रंजना [रंजू भाटिया] said...

पृथ्वी से बहुत दूर
एक सितारा
कुछ इस तरह टिम टिमाता रहता था।

सुन्दर लगी यह रचना इसको पढ़वाने का शुक्रिया प्रकाश जी

Arun Aditya said...

वाह, अजेय !

PREETI BARTHWAL said...

प्रकाश की कल्पनाओं से भरा बादल।
बहुत खूब

AJAY said...

arey main to bhool hi gaya tha k baadal ki badaulat mera ek blog bhi hai....thanks a-aa and others!